Friday, May 8, 2020

ये बाड़ ही खेत को खाएगी


पिछले कुछ वर्षों में जब से सोशल मीडिया ने भारत मे अपनी उपस्थिति दर्ज करवाकर अपना विस्तार शुरू किया इसे हम समाज मे एक युग परिवर्तन के तौर पर देख सकते है। दरअसल कट्टरवादी संगठन इस नवपरिवर्तन से पहले तक अपने अपने संस्थाओं, विद्यालयों, सभाओं, स्वलिखित साहित्य के माध्यम से अपना प्रचार-प्रसार कर रहे थे, अनुयायियों की संख्या में धीरे धीरे इज़ाफ़ा कर रहे थे। और ये शांतिपूर्ण तरीके से चल रहा था। शांतिपूर्ण इसलिए कह सकते है क्योंकि छिटपुट घटनाओं का दौर होता था। किसी राज्य के किसी कोने में घटित घटना को अखबार के किसी कोने में एक छोटा सा कॉलम या न्यूज चैनल पर नीचे चलने वाली पट्टी में हाइलाइट्स में कहीं जगह मिलती थी। इनसे उस जगह विशेष का तबका ही प्रभावित होता था जहाँ ये घटित हुई। कुछ दिनों में जांच हो जाया करती थी। दोषियों पर कार्यवाही की खबर भी मिल जाती थी। देशव्यापी कोई असर नजर नही आता था।  एक कारण और भी है शांतिपूर्ण कहने का क्योंकि किसी भी व्यक्ति को किसी विचारधारा से जुड़ने के लिए अपना समय खर्च करना होता था। लगातार संपर्क में रहकर उस विचारधारा के बारे में जानना होता था। उसके बाद धीरे धीरे कई वर्षों में जाकर वो कट्टरता के निर्धारित पैमाने पूरे करता था। लेकिन ऐसे लोगो की संख्या बहुत कम थी। चूंकि साधन और सुविधायें उतनी नही थी। तो रोजमर्रा की ज़िंदगी मे व्यक्ति के लिए अपने समाज, परिवार, व्यवसाय या नौकरी आदि से इतना समय निकाल पाना भी बहुत मुश्किल था।

मैं ऐसे बहुत से लोगो से परिचित हूँ जो मेरे आस पास भी है। जिन्हें मैं कट्टर व्यक्तियों  की श्रेणी में रख सकता हूँ। लेकिन फिर भी उनमे मुझे एक इंसानियत नजर आती है। खासकर कुछ बड़े बुजुर्ग जो है। उनके साथ बैठकर उन्ही के घर पर अगर किसी मुद्दे पर बहस चल रही हो तब भी बीच बीच मे चाय-पानी चलता रहता है। न ही कभी मुझे वहां असुरक्षा महसूस हुई, न धक्के देकर निकाला गया। कुछ युवा मित्र भी है जिनसे मतभेद है इन मामलों में, लेकिन प्रेम कम नही हुआ। यहाँ तक कि अपनी प्रवृति के विपरीत वे कुछ बातों पर अक्सर सहमत भी होते है। फिर अचानक से सोशल मीडिया और इंटरनेट के माध्यम से एक क्रांति आती है। हर घर तक, प्रत्येक व्यक्ति तक सोशल मीडिया की सुविधा और पहुंच हो जाती है। इसके बाद कट्टरता में एक नया बदलाव नजर आता है। विज्ञान की भाषा मे कहे तो जिस तरह म्युटेशन की वजह से कुछ पीढ़ियों के बाद प्रजाति में परिवर्तन नजर आने लगता है, ये वही म्युटेशन का समय था। अब ये कट्टर लोग पहले से अलग तरह के कट्टर है। क्योंकि ये सिर्फ कट्टर नही है, ये हिंसक भी है, संवेदनाशून्य भी है, इन्हें किसी की चोट और खून देखकर मजा आता है। ये उसका आनंद लेते है। यहां तक कि अपनी उस नई उत्त्परिवर्तित कट्टरता को सिद्ध करने के लिए ये अब नए नए  कहानियां गढते है और  बावजूद इसके इनको उस गलती का अहसास नहीं होता। क्योंकि दरअसल सोशल मीडिया द्वारा उन्हें उनके आकाओं द्वारा इस बात के लिए पूरी तरह से समझा दिया जाता है कि कुछ गलत नही हुआ। राष्ट्रवाद, संस्कृति, धर्म आदि के सामने  मानवता को कटघरे में खड़ा किया गया है। अब घर घर तक सोशल मीडिया की पहुंच है। यूट्यूब, वाट्सअप, फेसबुक के माध्यम से वो कट्टरता घर घर मे पहुँच गई। इसीलिए हम पिछले कुछ सालों में ये एक नया भारत, ये नए युवा, ये नए नागरिक देखते है। क्योंकि अब उन्हें प्रशिक्षण की क्लास घर बैठे ऑनलाइन मिल जाती है। स्कूल में पढ़ रहे बच्चे से लेकर उम्रदराज बुजुर्ग व्यक्ति तक, 12 घण्टे तक दुकान पर बैठ कर कोई व्यबसाय करने वाले से लेकर प्राइवेट नौकरी में शोषण और कार्याधिक्य से त्रस्त एक कर्मचारी तक, हर कोई राजनीति, शिक्षा, इतिहास, धर्म, अंतररष्ट्रीय संबंध, आदि के विशेषज्ञ के रूप में नजर आने लगे है। जो बेचारे कुछ पढ़ कर, कई वर्ष जिन्होंने साधना में लगा कर कुछ तथ्यों, सिद्धांतो, घटनाओं आदि पर अपना एक अनुभव प्राप्त किया है, उन्हें तो तुरंत खारिज ही नही अपमानित भी कर दिया जाता है। इसीलिए उनमे से अधिकांश लोग चुप्पी साध लेते है। ये कट्टरता की नई म्युटेशन पीढ़ी अब संभाले नही संभल रही।

 JNU, AMU, जामिया, राष्ट्रवाद, देशभक्ति, 370, पाकिस्तान, धर्म, संस्कार, आरक्षण, भारतीयता, हिंदुत्व, संविधान आदि ये सभी आजकल  चर्चित मुद्दे है। कई कई वर्षों से इन विषयों पर इंजेक्शन से भरी दवाई कट्टरता के माध्यम से भरी जा रही थी। फिर हुआ यूं कि इस कट्टरता से ये जींस/क्रोमोसोम अगली पीढ़ी में भरे जाने थे। लेकिन तभी होता है सोशल मीडिया का आगमन। कट्टरपंथी ताकतों को लगता है कि हमारा काम आसान हो गया, अब हमारे अनुयायी बढ़ाना भी आसान होगा। उनके दावे सही भी थे। काम भी आसान हुआ और संख्या भी बढ़ी। लेकिन इसी वक्त नई पीढ़ी जिन्हें कट्टर होना था वो कट्टर के साथ साथ एक नए रूप में नजर आती है। अब इनका गुस्सा जो बेरोजगारी, संसाधनों का अभाव, खराब शिक्षा व्यवस्था, मटियामेट चिकित्सा व्यवस्था, महंगाई, पिछली सरकारों के भ्रष्टाचार, परीक्षा प्रणाली की विसंगतियां, चयन में भाई भतीजावाद आदि से दबा पड़ा था उसे एक दिशा मिल जाती है। अब इनको रोकना सम्भव नही हो पा रहा। जैसे कि इन दिनों विश्विद्यालय के कुछ हमलों में ABVP के विद्यार्थीयों के शामिल होने के दावे किए जा रहे थे। वाट्सअप ग्रुप्स के स्क्रीनशॉट वाइरल भी हुए। कुछ हद तक उन नकाबपोश हमलावरो की पहचान भी हुई। बिल्कुल इस बात को सिरे से खारिज किया जा सकता है और लगातार किया भी जा रहा है कि JNU में नकाबपोशों ने जो हमले किये वो शाह, मोदी जी या आरएसएस और यहाँ तक कि ABVP के भी पदाधिकारियों के संज्ञान में लेकर हुए होंगे। खारिज किया भी जाना चाहिए। क्योंकि कोई भी कार्यरत सरकार इस तरह के कदम उठाना नहीं चाहेगी जिससे उसकी साख को बट्टा लगे या उसके लिए भविष्य में घातक सिद्ध हो। लेकिन अब स्थिति संभाले नही संभल रही। दरअसल उसी हिंदुत्व, 370, आरक्षण, JNU, मुसलमान आदि मुद्दों के माध्यम से अब शक्तियां और हौसले उस भीड़ तक पहुँच चुके है जो म्युटेशन का परिणाम है। इन्हें न विचारधारा से मतलब है, न ही संवेदना से, न राष्ट्रभक्ति से, न आतंकवाद से, न आरक्षण से समस्या है, न वामपंथ से। लेकिन इन्हे हर बार एक कवच चाहिए होता है अपने काम अंजाम देने के लिए।  ये बस भीड़ है, असभ्य, बर्बर, हिसंक। हालांकि इस म्युटेशन प्रजाति के उत्पन्न होने के बीज कई वर्षों पहले बो दिए गए थे, उन्हें सींचा जा रहा था, उन्हें फलने फूलने का वातावरण उपलब्ध करवाया जा रहा था। इसलिए उन संगठनों को कटघरे में हमेशा खड़ा किया जाएगा ही। अब ये तैयार है। साधन संपन्न है। सुविधायुक्त है। शक्तियां है इनके पास।  इंटरनेट, सोशल मीडिया जैसे माध्यम है। न्यूज एंकर भी है जो इनके पाशविक कृत्यों को, डॉक्टरल वीडियो को, झूठी अफवाहों को, वाट्सअप यूनिवर्सिटी के इतिहास को शोध आधारित बता कर इन्हें लगातार मासूम बता कर इनके लिये सुरक्षा कवच तैयार कर रहे है। अधिकारी भी है जो प्रशासन में कहीं न कहीं बैठे है इन्हें मदद के लिए या आँख मुंदने के लिए। सत्ता में बैठे कुछ लोग भी है जो इनका हौसला बुलंद कर रहे है। बीजेपी और आरएसएस के कई नेताओं के सचेतन नफरत से भरे बयान या अवचेतन मे पैठे कुछ विचार, जिन्हें बिगड़े बोल कह सकते है, यूट्यूब पर आसानी से उपलब्ध है। जो कभी किसी धर्म, सम्प्रदाय या जाति के खिलाफ निकल कर सामने आए है। सोने पे सुहागा ये की अकर्मण्य और नेतृत्वहीन विपक्ष भी है जो अपनी भूमिका ठीक ढंग से नही निभा रहा। इसलिए स्टूडेंट्स इन्हें नजर आते है, विश्विद्यालय के परिसर इन्हें अपने अहंकार की भूख शांत करने का जरिया नजर आता है। क्योंकि स्टूडेंट जो पढ़ रहे है, जो जानते है, जो बोल रहे है, जो आवाज़ उठा रहे है, जहाँ समसामयिक विषयो और ज्वलंत मुद्दों पर चिंतन चल रहा है, जो शिक्षक उन विद्यार्थियों को सही-गलत, न्याय-अन्याय, धर्म-अधर्म, आदि समझा रहै है, उनको सरकार के खिलाफ होने का तमगा आसानी से मिल रहा है। इसलिए उसे टुकड़े टुकड़े गैंग, अर्बन नक्सल, सरकार विरोधी कह कर आसानी से अपनी पाशविक प्रवृतियों को पूरा करने और उसके बाद निर्दयी अट्टाहास करने का इन्हें मौका मिल रहा है। लेकिन ये मौका इन्हें उसी के पीछे रहकर मिलेगा जिन्होंने भूमिका निभाई इन्हें पल्लवित करने में।

अब ये फ्रंट फुट पर खेल रहे है। अब बल्ला इनके हाथ मे है तो कभी बॉल होती है। जो भी हो इन्हें उस बैट या बल्ले का असली उपयोग नही आता। इन्हें खेलना नही आता। इन्हें सिर्फ उसका हथियार की तरह इस्तेमाल करना आता है, सर फोड़ना आता है, चोट पहुंचाना आता है। शीशे तोड़ना, दरवाजे, खिड़की, कुर्सियां, लाइब्रेरी तोड़ना आता है। बंदर के हाथ मे चाकू होने की कहावत सुनी है हमने। अब ये न आरएसएस से संभलेंगे, न बीजेपी से, न किसी विद्यार्थी संगठन से। क्योंकि इन सब संगठनों में अब उस विचारधारा के लोग नही जिसने ये लोकतंत्र मजबूत करने में, अहंकारिक सत्ताओं को औकात दिखाने में, हर तरह के जायज नाजायज हथकंडे अपनाने के बावजूद देश के बारे में सोचने के लिए कभी अपनी भूमिकाए निभाई थी। अब इन संगठनों के नाम पर भीड़ काबिज है, पशुओं के हाथ मे शक्तियां है। कभी जिन्हें सुरक्षा घेरा बना कर अपने इर्द गिर्द जमाया गया था। ये बाड़ ही अब खेत को खाएगी। क्योंकि सत्ता प्राप्त करने का साधन चयन करते वक़्त दूरदर्शिता नही रखी गई। गलती से समस्याओं को चयन करने की बजाए व्यक्तियों का चयन कर लिया गया साध्य प्राप्ति के लिए। व्यक्तियों का यानी मनुष्य जिसकी मूल प्रवृत्ति पाशविक है। जिसे शिक्षा और संस्कार के द्वारा शोधन करके पशुत्व से देवत्व की और मार्गन्तिकरण किया जाना होता है। अशिक्षित, असभ्य, अनपढ़, कुपढ़ मनुष्य तो भयानक, हिंसक, बर्बर, जंगली होना ही था।

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